सोमवार, 31 अक्तूबर 2016

कविता- देश का भेष



बदलने को तो देश का भेष कम नहीं बदला ।
मांग का सिंदूर हाथों में मेहंदी का चलन नहीं बदला ।
मां का ममतामई आंचल दध का रंग नहीं बदला ।
बहन का प्यार वो राखी का बंधन नहीं बदला ।
बेटियां आँगन का फूल बाप के कंधों का बोझ नहीं बदला ।
 घर के चिरागों की खातिर अजन्माओं की हत्या का
 सिलसिला नहीं बदला ।
व्रत रखें कोई सावित्री, सीता की अग्निपरीक्षा का
 मंज़र नहीं बदला ।
सदियां बदली हैं, जमाना बदला हैं, यूं तो औरत का
रूप-रंग कम नहीं बदला ।
मगर औरत की आंखों से अश्कों का रिश्ता नहीं बदला ।
बदलने को तो देश का भेष कम नहीं बदला ।
                तरूण कुमार, सावन