शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

कविता - नया साल



ग्रहों की चाल देखकर क्या कोई हाले दिल बताएँगा

मजिंल का पता शायद आने वाला साल बताएँगा



प्यार की लाली ही क़ाफ़ी है

फ़ागुन का गुलाल रहने दो

अपने हाथों का क़माल रहने दो

हमें ये मलाल रहने दो

हमारे हिस्सें में ज़न्नत हैं तो ज़मीं पर क्यूँ

नहीं मिलती ये सवाल रहने दो

तुम्हारे बिन जो गुज़र रहें हैं दिन

उनका हाल-चाल रहने दो



जो टूटकर गिरा हैं आँख से वो ही हाल बताएँगा

हमारा हाल-चाल क्या गुजरा हुआ साल बताएँगा



किसी के बालों में उलझे हैं
मछली का ये जाल रहने दो

ख़त भेजा हैं ख़त का ज़वाब

दें देना, ये मोबाईल रहने दो

चूप-चूप मेरी आवाज़ सुनने का

ये बहाना भी अच्छा है

सीधें कॉल कर लेना

अब ये मिस कॉल रहने दो



तुम्हें पाकर हुआ हैं जो मालामाल बताएँगा

हमारे दिल का हाल अब नया साल बताएँगा



तरूण कुमार, सावन


सोमवार, 31 अक्तूबर 2016

कविता- देश का भेष



बदलने को तो देश का भेष कम नहीं बदला ।
मांग का सिंदूर हाथों में मेहंदी का चलन नहीं बदला ।
मां का ममतामई आंचल दध का रंग नहीं बदला ।
बहन का प्यार वो राखी का बंधन नहीं बदला ।
बेटियां आँगन का फूल बाप के कंधों का बोझ नहीं बदला ।
 घर के चिरागों की खातिर अजन्माओं की हत्या का
 सिलसिला नहीं बदला ।
व्रत रखें कोई सावित्री, सीता की अग्निपरीक्षा का
 मंज़र नहीं बदला ।
सदियां बदली हैं, जमाना बदला हैं, यूं तो औरत का
रूप-रंग कम नहीं बदला ।
मगर औरत की आंखों से अश्कों का रिश्ता नहीं बदला ।
बदलने को तो देश का भेष कम नहीं बदला ।
                तरूण कुमार, सावन