मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

कहानी- अन्तिम अध्याय


जब भी अकेला होता हूँ तुमसे बाते कर लेता हूँ। जानता हूँ तुम सुन नहीं रहीं हो, फिर भी मन नहीं मनता। ऐसा भी नहीं हैं कि मेरे आस-पास लोग नहीं हैं बाते करनें के लिए। मगर उनसे बाते करते हुए कुछ अच्छा नहीं लगता हैं।
तुम्हें सोचते हुए जाने-पहचाने रास्तों पर अनजाने ही निकल पड़ता हूँ। यूँ तो हम दोनों की सोच मेल नहीं ख़ाती। मगर तुम्हारे ख़्यालों से लड़ते-झगड़ते हुए लगता हैं तुम भी साथ चल रहीं हो।
रास्ते में दिख जाता हैं वो मंदिर जहाँ हम अक्सर मिलते थे। भगवान के पास बैठ कर कई बार साथ जीने-मरने की कसमें खाई। लेकिन आज वहाँ मेरे लिए कोई भगवान नहीं हैं, तुम जो मेरे साथ नहीं हो। बिना भगवान के दर्शन किए ही आगें बड़ जाता हूँ।  
पास में ही वह काँलेज हैं हमारा, जहाँ मैने तुम्हें पहली बार देखा था। सब कुछ बदल गया था मेरे लिए, कभी-कभी काँलेज जाने वाले कदम हर दिन पड़ने लगें थे काँलेज में। शायद प्रेम का पाठ पढ़ने की जल्दी थी। वह काँलेज तुम्हारे जाने के बाद छोड़ दिया हैं, कोई प्रेम का पाठ पढ़ाने वाला जो नहीं रहा। फ़िर भी कभी-कभी ऊब कर जा बैठता हूँ काँलेज की सीड़ियों पर, इस विश्वास के साथ शायद किसी दिन फिर तुम मेरी बगल में आकर बैठ जाओंगी।
ये लो मैं काँलेज की बाते करता-करता पार्क तक आ गया। यह ही हैं वो ज़न्नत जहाँ हमारी मोहब्बत परबान चड़ी थी। वहाँ सामने वो बड़ा सा पेड़ हैं, जिसके साएं में बैठ कर हम दोनों बाते किया करते थे। जिस पर तुमने एक दिल बना कर हम दोनों के नाम लिख दिए थे। जो धीरे-धीरे मिट रहें हैं। मन तो करता हैं जाकर उन्हें फ़िर से सवार दूँ। लेकिन यह सोच कर रह जाता हूँ अब इसकी ज़रूरत क्या हैं। यहीं वह जगह भी हैं जहाँ तुम मुझे अकेला छोड़ गई थी। सदा के लिए फ़िर कभी न लोटने की कह कर। हरियाली में जाकर जख़्म हरे हो जाते हैं। इसलिए नहीं जाता उधर कभी।

ये मेरी प्रेम कहानी अन्तिम अध्याय हैं,लेकिन इस शहर का आख़री पड़ाव नहीं हैं। यहाँ से आगे भी अनजान सड़के है, गुमनाम गलियाँ हैं। और न जाने मेरी ही जैसी कितनी ही अँधूरी प्रेम कहानियाँ हैं। लेकिन में वहाँ कभी नहीं जाता। तुमसे प्रेम करके में स्वार्थी भी हो गया हूँ। ईश्वर से जब भी माँगता हूँ, अपने लिए तुम्हें ही बस यहीं तक सीमित होकर रह गया हूँ। इस असीमित संसार में।

  

बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

लघु-कथा - मजबूरी या समझदारी


शर्मा जी ने जब अपने बेटे राजेश से अपने खर्चे के सिए कुछ पैसे मांगे, तो राजेश नाक-भौं सिकोड़ने हुए बोला, पिताजी आपका क्या हैं? आप तो दिन भर घर में रहते हैं। आपको पता भी है कि महंगाई किस क़दर बढ़ चुकी हैं। अब तो घर खर्च के लिए मेरी तनख्वाह भी कम पड़ने लगी हैं।
ऐसे में मैं आप पर ज्यादा पैसे खर्च करने में समर्थ नहीं हूँ। मुझे अपने परिवार के भविष्य के बारे में भी तो सोचना हैं।
मिस्टर शर्मा यह सुनते ही सकते में आ गए। वह बोले, बेटा, मैंने भी अपने परिवार का ध्यान रखा हैं, पर अपने माँ-बाप को तो नहीं भूल गया।राजेश लगभग चीखते हुए बोला, मैं नहीं जानता यह सब। आपको यह गवारा न हो, तो आप जहाँ चाहे, जा सकते हैं।अब तो शर्मा जी का पारा सातवें आसमान पर था। तुरन्त तय कर लिया कि अब बेटे के साथ नहीं रहना हैं। अपमानित होकर यहाँ रहने से तो अच्छा है, कि कहीं और जाकर रहें। घर से बाहर निकलते ही सोचने लगे कि कहाँ जाएँ।
तभी पीछे से बचपन के मित्र वर्मा जी आ गए। और बोले कहाँ चले?” शर्मा जी ने एक ही सांस में सारी कहानी उन्हें सुना ड़ाली। वर्मा जी ने ठंड़ी सांस छोड़ते हुए कहाँ, शर्मा मेरे दोस्त, तुम्हें घर छोड़कर नहीं आना चाहिए था। आखिर उम्र के इस पड़ाव पर हमें किसी न किसी सहारा चाहिए। वह सहारा बच्चों से ही मिल सकता हैं। और फ़िर सोचो कि घऱ छोड़कर कहाँ जाओगे। सड़क पर ठोकर खाने से अच्छा हैं, घर लोट जाओं, इसी में समझदारी हैं।दोस्त की सलाह मानी और बुदबुदाते हुए बढ़ने लगे कि यह समझदारी नहीं, एक बूढ़े बाप की मजबूरी हैं।
                    



 
समाचार-पत्र अमर उजाला कॉम्पैक्ट में शुक्रवार 9दिसंबर 2011में प्रकाशित

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

राख़ी याद आती हैं


सावन आया सजनें लगें मेले, तो राख़ी याद आती हैं।
बहना हैं ससुराल में, सुने हुए झुले, तो राख़ी याद आती हैं।
कल तक थी माँ-बाप की छाओं में, अब सास-ससुर के गाओं में
जब घर की याद आता हैं, तो माँ की याद आती हैं।
जब बहना याद आती हैं, तो राख़ी याद आती हैं।

बहना के हाथ का रोली चावल चंदन करें माथे का अभिनंदन।
सजाएं कलाई पर कच्चें धागों में पक्कें का प्रेम सच्चा बंधंन।
कल तक खेल रहीं थी घर के आँगन में, अब पिया के प्रांगण में
जब दीया याद आता हैं, तो वाती याद आती हैं।
जब बहना याद आती हैं, तो राख़ी याद आती हैं।
                           
                 
                तरूण कुमार, सावन
                 चित्र-Google  

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

तिरंगा जिनके लिए कफन है



 
     जिनकी वीरता और शौर्य के गीत भजन है,
             उनको नमन है।     
      जिनकी कुर्बानियों पर नीर भरे नयन है,
              उनको नमन है।
           जो शाहदत का फूल बने,
         दुश्मन की आँखों का शूल बने।
    रणभूमि में जाकर जो शिवजी का त्रिसूल बने।
    माँ भारती की धूल जिनके माथे का चंदन है।
          तिरंगा जिनके लिए कफन है,
               उनको नमन् है ।।
     बेटे वही जिनमें प्राण देकर दूध का कर्ज
           चुकाने की इच्छा प्रबल है।
         माँ वहीं जो दूध के साथ नैनों के
             अर्पण करती कमल है।
       जिसकी लोरी और कहानी के नायकों में
     आज भी राजगुरू,सुखदेव भगत सिंह सी लग्न है।
        आजाद भारत की धरती और गगन है,
                उनको नमन है।।
               बहन वहीं जो ये कहें,  
       मातृभूमि मान बढाना तुम्हें राँखी की कसम है।
               पिता वहीं जो ये कहें,  
        रण में लड़ना ही तुम्हारा कर्म और धर्म है।
         तुम बिन सुना माँ यशोदा का आँगन,
               नंद के वन उपवन हैं।
      शीश देने की कला में माहिर जो भारत के रतन है,
                 उनको नमन है।।
         नव यौवनाओं के लड़कपन की चहक।
         कली से फूल बनें नव श्रृंगार की महक।
            शब्द भी जब कंठ में गए थे अटक,
              मांग से झड़ते सिदूंर की धमक,
               चूड़ियों के चटकने की कसक
            चुटकी भर उस लाल रंग की चमक
            जिससे कायम हैं भारत का चमन है,
                      उसको नमन है ।।
                तिरंगा जिनके लिए कफन है,
                       उनको नमन है ।। 
                                 
       द सी एक्सप्रेस में प्रकाशित मेरी तीन कविताओं में से एक यह भी।                              
         तरूण कुमार, सावन